मद्रास हाईकोर्ट में ‘जन नायकन’ सर्टिफिकेशन विवाद: फैसला सुरक्षित, सीबीएफसी ने कहा– प्रमाणपत्र जारी होने तक अधिकार बरकरार
चेन्नई, 20 जनवरी: अभिनेता और नेता विजय की तमिल फिल्म ‘जन नायकन’ को लेकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) और निर्माता के बीच जारी कानूनी विवाद में मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने मंगलवार को सुनवाई पूरी करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। मामला इस बात से जुड़ा है कि क्या CBFC चेयरपर्सन किसी फिल्म को यूए सर्टिफिकेट की सिफारिश के बाद भी रिवाइजिंग कमेटी को भेज सकते हैं या नहीं।
विवाद की पृष्ठभूमि क्या है?
फिल्म निर्माता केवीएन प्रोडक्शंस को 22 दिसंबर 2025 को चेन्नई स्थित क्षेत्रीय सीबीएफसी कार्यालय से सूचना मिली थी कि एग्ज़ामिनिंग कमेटी ने कुछ कट्स के साथ फिल्म को ‘UA’ सर्टिफिकेट देने की सिफारिश की है।
29 दिसंबर को निर्माता ने सुझाए गए संशोधन कर दिए और क्षेत्रीय कार्यालय ने बताया कि जल्द ही यूए सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाएगा।
हालांकि, 5 जनवरी 2026 को अचानक एक नया पत्र आया जिसमें बताया गया कि “सक्षम प्राधिकारी” ने फिल्म को रिवाइजिंग कमेटी के पास समीक्षा के लिए भेजने का निर्णय लिया है। इसके बाद निर्माता ने 6 जनवरी को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सिंगल जज ने निर्माता के पक्ष में फैसला देते हुए कहा था कि एक बार सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी थी, इसलिए चेयरपर्सन के पास फिल्म को दोबारा रिव्यू के लिए भेजने का अधिकार नहीं बचता। इसी आदेश के खिलाफ सीबीएफसी ने डिवीजन बेंच में अपील की थी, जिस पर आज सुनवाई हुई।
अदालत में आज क्या दलीलें दी गईं?
सीबीएफसी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एआरएल सुंदरसन ने दो मुख्य तर्क रखे:
- सीबीएफसी को जवाब दाखिल करने का पर्याप्त मौका नहीं दिया गया।
उन्होंने कहा कि सिंगल जज के सामने उन्होंने पहले ही कहा था कि 5 जनवरी के पत्र को चुनौती नहीं दी गई है और बोर्ड को जवाब देने का अवसर मिलना चाहिए था, लेकिन कोर्ट ने बिना काउंटर एफिडेविट के ही फैसला सुना दिया। - क्षेत्रीय कार्यालय की सिफारिश अंतिम निर्णय नहीं थी।
ASG ने स्पष्ट किया कि चेन्नई क्षेत्रीय कार्यालय केवल एक सलाहकार पैनल की तरह काम करता है। असली निर्णय लेने का अधिकार मुंबई स्थित बोर्ड के पास होता है।
डिवीजन बेंच ने इस पर पूछा,
“तो क्या यह क्षेत्रीय समिति सिर्फ सलाह देने वाली है, निर्णय लेने वाली नहीं?”
ASG ने जवाब दिया, “जी हां, माननीय न्यायालय, उनकी सिफारिश बाध्यकारी नहीं होती।”
उन्होंने यह भी बताया कि बोर्ड को एक शिकायत मिलने के बाद ही सर्टिफिकेशन प्रक्रिया को रोककर फिल्म को रिवाइजिंग कमेटी के पास भेजा गया था, जो नियमों के तहत 20 दिनों के भीतर निर्णय लेने के लिए बाध्य है।
निर्माता पक्ष की दलीलें
निर्माता की ओर से वरिष्ठ वकील सतीश परासरन ने कहा कि:
- एग्ज़ामिनिंग कमेटी ने सर्वसम्मति से यूए सर्टिफिकेट की सिफारिश की थी।
- बाद में अगर एक सदस्य अपना मत बदल भी ले, तो भी बहुमत का निर्णय मान्य होना चाहिए।
- विवादित दृश्यों को पहले ही हटा दिया गया था, लेकिन अब बोर्ड फिर से वही प्रक्रिया दोहराने के लिए कह रहा है, जो “बेकार की औपचारिकता” है।
उन्होंने कहा,
“वे चाहते हैं कि हम हटाए गए दृश्यों को फिर से जोड़ें, फिल्म वैसे ही जमा करें और फिर वही कट्स दोबारा करें। यह पूरी तरह से तथ्यात्मक मामला है और इसमें कोई विवाद नहीं है।”
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने कहा कि सिंगल जज का यह मानना कि “एक बार निर्माता को सर्टिफिकेशन का संचार हो जाने के बाद सीबीएफसी का अधिकार समाप्त हो गया”, इस पर पुनर्विचार की जरूरत है।
ASG ने इस पर जोर देते हुए कहा,
“प्रमाणपत्र जारी होने तक प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाती। जब तक सर्टिफिकेट गजट में प्रकाशित नहीं होता, बोर्ड के पास अधिकार बना रहता है।”
अब आगे क्या?
डिवीजन बेंच ने सभी दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट का निर्णय न केवल इस फिल्म बल्कि भविष्य में सीबीएफसी की सर्टिफिकेशन प्रक्रिया पर भी बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
फिल्म ‘जन नायकन’ को लेकर कानूनी लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर है और उद्योग की नजरें हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हुई हैं।
