शिवाजीनगर (समस्तीपुर): साल के आखिरी कार्य दिवस पर बुधवार को शिवाजीनगर प्रखंड के प्रारंभिक विद्यालयों में रौनक सामान्य दिनों से अलग थी। मौका था ‘हर एक बच्चा, श्रेष्ठ बच्चा’ थीम पर आयोजित विशेष अभिभावक-शिक्षक संगोष्ठी (PTM) का। विभागीय निर्देशों के आलोक में आयोजित इस बैठक ने विद्यालयों में एक उत्सव जैसा माहौल पैदा कर दिया, जहाँ शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों के सर्वांगीण विकास पर खुली चर्चा हुई।
प्रखंड के प्राथमिक विद्यालय कनखरिया, जगदर, पुरन्दाही, बंधार और कलवारा सहित सभी स्कूलों में शिक्षकों और अभिभावकों ने एक साथ बैठकर बच्चों के सुनहरे भविष्य का रोडमैप तैयार किया।
पढ़ाई के साथ सेहत पर भी चर्चा
संगोष्ठी में केवल किताबों और सिलेबस की बात नहीं हुई, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर भी अभिभावकों को जागरूक किया गया।
- एनीमिया मुक्त बचपन: शिक्षकों ने बच्चों में खून की कमी (एनीमिया) को रोकने के लिए ‘आयरन फोलिक एसिड’ की टेबलेट्स के महत्व को समझाया।
- स्वच्छता और पोषण: बेहतर अधिगम (Learning) के लिए स्वस्थ शरीर की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
प्रगति पत्रक और आधुनिक शिक्षण पद्धति
बैठक के दौरान प्रधानाध्यापकों ने अभिभावकों को बताया कि बीते सत्र में शिक्षण पद्धति में क्या-क्या बदलाव किए गए हैं। अनुशासन, नियमित उपस्थिति और कक्षा-कक्ष की नई व्यवस्थाओं के कारण बच्चों के सीखने के स्तर (Learning Outcome) में जो सुधार आया है, उसे देख अभिभावक भी उत्साहित नजर आए।
प्राथमिक विद्यालय कनखरिया के प्रधानाध्यापक मो. अब्दुल्लाह और शिक्षिका नीलू कुमारी ने साझा किया कि सरकारी विद्यालयों में अब बच्चों के पोषण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे घर पर भी बच्चों की पढ़ाई के लिए समय निकालें।
इन दिग्गजों की रही मौजूदगी
इस व्यापक अभियान को सफल बनाने में प्रखंड के तमाम शिक्षाविदों ने सक्रिय भूमिका निभाई। मौके पर पूर्व बीआरपी सह प्रधानाध्यापक बालमुकुंद सिंह, देवानंद कामद, सुभाष सिंह, संतोष कुमार, अजय कुमार राय, रामबाबू सिंह और शांति भूषण राय सहित दर्जनों प्रधानाध्यापकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
वहीं, अभिभावकों की ओर से देवन पासवान, कविता देवी, आशा कुमारी और रेणू राय जैसे कई लोगों ने विद्यालय प्रशासन की इस पहल का स्वागत किया।
एक साझा संकल्प: शिक्षा में सुधार
संगोष्ठी का समापन एक सामूहिक संकल्प के साथ हुआ। शिक्षकों का मानना है कि जब तक अभिभावक विद्यालय की गतिविधियों में रुचि नहीं लेंगे, तब तक पूर्ण सुधार संभव नहीं है। इस तरह की नियमित बैठकों से न केवल संवाद की खाई पटी है, बल्कि बच्चों की शिक्षा के प्रति एक जवाबदेही भी तय हुई है।
